फैटी लीवर: समझें और बचाव करें
फैटी लीवर के प्रकार
मुख्य रूप से दो प्रकार के फैटी लीवर होते हैं:
अल्कोहोलिक फैटी लीवर:(AFLD)
यह अधिक मात्रा में शराब पीने के कारण होता है।जैसा कि नाम से पता चलता है, यह अत्यधिक शराब के सेवन के कारण होता है। शराब को तोड़ने की प्रक्रिया में लिवर में हानिकारक पदार्थ बनते हैं जो लिवर कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाते हैं और वसा के जमाव को बढ़ाते हैं।
- शुरुआती चरण: शराब छोड़ देने पर यह स्थिति अक्सर ठीक हो जाती है।
- गंभीर चरण: यदि शराब पीना जारी रखा जाए, तो यह अल्कोहलिक हेपेटाइटिस और अंततः लिवर सिरोसिस में बदल सकता है।
नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लीवर (NAFLD):
यह उन लोगों में होता है जो अधिक शराब नहीं पीते हैं। NAFLD आमतौर पर मोटापे, टाइप 2 डायबिटीज और उच्च कोलेस्ट्रॉल के साथ जुड़ा होता है।आजकल की खराब जीवनशैली और खान-पान इसका मुख्य कारण है। इसके दो रूप होते हैं:
- साधारण फैटी लिवर (Simple Fatty Liver): इसमें लिवर में वसा तो होता है, लेकिन लिवर की कोशिकाओं में सूजन या क्षति कम होती है। यह आमतौर पर ज्यादा खतरनाक नहीं होता।
- नॉन-अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH): यह अधिक गंभीर स्थिति है। इसमें वसा के साथ-साथ लिवर में सूजन (Inflammation) भी होती है, जो लिवर को नुकसान पहुँचा सकती है और आगे चलकर सिरोसिस या लिवर कैंसर का कारण बन सकती है।
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| फैटी लीवर: समझें और बचाव करें |
गर्भावस्था का तीव्र फैटी लिवर (Acute Fatty Liver of Pregnancy - AFLP):
यह गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में होने वाली एक दुर्लभ लेकिन गंभीर स्थिति है। इसमें तुरंत चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है।
फैटी लीवर के लक्षण:
1. शुरुआती और सामान्य लक्षण
शुरुआत में ये लक्षण बहुत सामान्य लग सकते हैं:- लगातार थकान: बिना किसी भारी काम के भी शरीर में कमजोरी और थकान महसूस होना।
- पेट के दाहिने हिस्से में दर्द: पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से (जहां लीवर होता है) में हल्का दर्द, भारीपन या दबाव महसूस होना।
- भूख में कमी: धीरे-धीरे भूख कम लगना या खाने की इच्छा कम होना।
- वजन कम होना: बिना किसी प्रयास के अचानक वजन में गिरावट आना।
2. पाचन से जुड़े लक्षण
लीवर की कार्यक्षमता प्रभावित होने पर पाचन संबंधी समस्याएं होने लगती हैं:- उल्टी या मतली (Nausea): बार-बार जी मिचलाना या ऐसा महसूस होना कि उल्टी आएगी।
- गैस और एसिडिटी: भोजन का सही से न पचना और लगातार पेट फूलना।
- पेट में सूजन: लीवर का आकार बढ़ने के कारण पेट बाहर की ओर निकला हुआ या सूजा हुआ दिखना।
3. गंभीर स्थिति के लक्षण (लीवर सिरोसिस या इन्फ्लेमेशन)
जब फैटी लीवर की समस्या बढ़ जाती है, तो निम्नलिखित गंभीर लक्षण दिख सकते हैं:- पीलिया (Jaundice): आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ जाना।
- पेशाब का गहरा रंग: पेशाब का रंग सामान्य से अधिक गहरा या पीला होना।
- पैरों में सूजन: पैरों और टखनों में तरल पदार्थ जमा होने के कारण सूजन (Edema) आना।
- त्वचा में खुजली: शरीर में पित्त (Bile) बढ़ने के कारण त्वचा में तेज खुजली होना।
- मानसिक भ्रम: ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई या बार-बार भूलना।
फैटी लीवर के ग्रेड (Grades)
लीवर में फैट की मात्रा के आधार पर इसे मुख्य रूप से 3 श्रेणियों में रखा जाता है:- ग्रेड 1: यह शुरुआती स्तर है, जिसे सही आहार और व्यायाम से आसानी से ठीक किया जा सकता है।
- ग्रेड 2: इसमें लीवर में सूजन आने लगती है और उपचार की आवश्यकता होती है।
- ग्रेड 3: यह गंभीर स्थिति है, जिसमें लीवर पर घाव (Scarring) होने लगते हैं, जिसे 'फाइब्रोसिस' या 'सिरोसिस' कहा जा सकता है।
फैटी लीवर के कारण
1. खान-पान और जीवनशैली से जुड़े कारण (NAFLD)
इसे नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज कहा जाता है। इसके मुख्य कारण हैं:
- मोटापा (Obesity): शरीर का अधिक वजन, विशेष रूप से पेट के आसपास की चर्बी, लीवर में फैट जमा होने का सबसे बड़ा कारण है।
- टाइप 2 डायबिटीज: शरीर में इंसुलिन का सही इस्तेमाल न हो पाना (Insulin Resistance) लीवर में फैट बढ़ा देता है।
- गलत आहार: अधिक चीनी (विशेषकर फ्रुक्टोज), कार्बोहाइड्रेट और प्रोसेस्ड फूड का सेवन।
- हाई कोलेस्ट्रॉल: खून में ट्राइग्लिसराइड्स या खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) का स्तर बढ़ना।
- शारीरिक निष्क्रियता: व्यायाम न करना और सुस्त जीवनशैली।
2. शराब का अत्यधिक सेवन (AFLD)
इसे अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज कहा जाता है। भारी मात्रा में शराब पीने से लीवर उसे मेटाबोलाइज नहीं कर पाता, जिससे लीवर की कोशिकाओं में सूजन और फैट जमा होने लगता है।
3. अन्य महत्वपूर्ण कारण
- दवाइयों के दुष्प्रभाव: कुछ स्टेरॉयड, कीमोथेरेपी की दवाएं या अन्य हैवी दवाओं के लंबे समय तक सेवन से।
- तेजी से वजन कम करना: बहुत कम समय में बहुत ज्यादा वजन घटाने से भी लीवर पर दबाव पड़ता है।
- जेनेटिक्स: कुछ लोगों में आनुवंशिक कारणों से भी यह समस्या हो सकती है।
- मेटाबोलिक सिंड्रोम: हाई बीपी, हाई ब्लड शुगर और बढ़ा हुआ पेट—इन तीनों का कॉम्बिनेशन फैटी लीवर का खतरा बढ़ा देता है।
- विषाक्त पदार्थ (Toxins): कुछ रसायनों के संपर्क में आने से।
फैटी लीवर का निदान
फैटी लीवर का निदान करने के लिए डॉक्टर आपके मेडिकल इतिहास के बारे में पूछेंगे, शारीरिक परीक्षण करेंगे और कुछ परीक्षण करवा सकते हैं, जैसे कि:
लीवर एंजाइम टेस्ट:
लीवर फंक्शन टेस्ट (Liver Function Test - LFT) खून की जांचों का एक समूह है, जिसका उपयोग आपके लीवर (यकृत) के स्वास्थ्य को मापने के लिए किया जाता है। यह टेस्ट यह पता लगाने में मदद करता है कि आपका लीवर कितनी अच्छी तरह काम कर रहा है और क्या इसमें किसी प्रकार की सूजन या क्षति है।
इस टेस्ट में रक्त में मौजूद प्रोटीन, लीवर एंजाइम और बिलीरुबिन के स्तर को मापा जाता है। मुख्य पैरामीटर्स निम्नलिखित हैं:
- बिलीरुबिन (Bilirubin): यह पुराने लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है। इसकी अधिक मात्रा पीलिया (Jaundice) का संकेत देती है।
- ALT (SGPT) और AST (SGOT): ये एंजाइम लीवर की कोशिकाओं में होते हैं। अगर लीवर को नुकसान पहुँचता है, तो ये खून में मिल जाते हैं और इनका स्तर बढ़ जाता है।
- ALP (Alkaline Phosphatase): यह एंजाइम लीवर और हड्डियों में पाया जाता है। इसका बढ़ा हुआ स्तर पित्त नली (Bile duct) में रुकावट का संकेत हो सकता है।
- एल्ब्यूमिन (Albumin) और कुल प्रोटीन: लीवर शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन बनाता है। इनका कम स्तर लीवर की बीमारी या पोषण की कमी दर्शा सकता है।
लीवर अल्ट्रासाउंड
फैटी लिवर (Fatty Liver) की जांच के लिए अल्ट्रासाउंड सबसे आम, सुरक्षित और दर्द रहित तरीका है। इसे मेडिकल भाषा में 'Abdominal Ultrasound' कहा जाता है।यहाँ इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है:
अल्ट्रासाउंड कैसे मदद करता है?
जब लिवर में अतिरिक्त वसा (Fat) जमा हो जाती है, तो अल्ट्रासाउंड तरंगें लिवर से टकराकर अलग तरह से वापस आती हैं। डॉक्टर स्क्रीन पर लिवर की 'ब्राइटनेस' (Echogenicity) देखकर फैटी लिवर का पता लगाते हैं।
लीवर बायोप्सी:
लिवर बायोप्सी (Liver Biopsy) एक ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें लिवर (यकृत) से ऊतक (tissue) का एक छोटा सा नमूना निकाला जाता है ताकि सूक्ष्मदर्शी (microscope) की मदद से उसकी जाँच की जा सके। यह परीक्षण मुख्य रूप से लिवर की बीमारियों का सटीक निदान करने और क्षति की सीमा जानने के लिए किया जाता है।
यहाँ लिवर बायोप्सी से जुड़ी मुख्य जानकारियाँ दी गई हैं:
जब खून की जाँच (LFT) या इमेजिंग टेस्ट (जैसे अल्ट्रासाउंड या CT स्कैन) से बीमारी का स्पष्ट पता नहीं चलता, तब डॉक्टर बायोप्सी की सलाह देते हैं। इसके मुख्य कारण हैं:
- बीमारियों का निदान: हेपेटाइटिस B या C, फैटी लिवर डिजीज, और ऑटोइम्यून बीमारियाँ।
- कैंसर की जाँच: लिवर में ट्यूमर या कैंसर कोशिकाओं का पता लगाने के लिए।
- क्षति का स्तर: सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ना) या फाइब्रोसिस की गंभीरता को मापने के लिए।
- इलाज की निगरानी: चल रहे इलाज का लिवर पर कितना असर हो रहा है, यह देखने के लिए।
फैटी लीवर का उपचार
फैटी लीवर का उपचार इसके कारणों पर निर्भर करता है। उपचार में शामिल हो सकते हैं:
* वजन कम करना: वजन कम करने से लीवर में वसा कम हो सकती है।
* स्वस्थ आहार: संतुलित आहार लेने से लीवर को स्वस्थ रहने में मदद मिल सकती है।
* शारीरिक गतिविधि: नियमित व्यायाम करने से वजन कम करने और लीवर को स्वस्थ रखने में मदद मिल सकती है।
* दवाएं: कुछ मामलों में, डॉक्टर दवाएं लिख सकते हैं।
यदि आपको फैटी लीवर के कोई लक्षण दिखाई देते हैं, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
नोट: यह जानकारी केवल सूचना के उद्देश्य से है और इसे किसी चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें।
* स्वस्थ वजन बनाए रखें: नियमित व्यायाम करें और संतुलित आहार लें।
* मधुमेह और उच्च कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें: डॉक्टर की सलाह अनुसार दवाएं लें और जीवनशैली में सुधार करें।
* शराब का सेवन कम करें या बंद करें: शराब लीवर को नुकसान पहुंचा सकती है।
* स्वस्थ आहार लें: फलों, सब्जियों, साबुत अनाज और कम वसा वाले प्रोटीन से भरपूर आहार लें।
* हेपेटाइटिस से बचाव: हेपेटाइटिस बी और सी के टीके लगवाएं।
* वजन कम करें: यदि आप अधिक वजन वाले हैं तो धीरे-धीरे वजन कम करने का प्रयास करें।
कब डॉक्टर को दिखाएं:
* यदि आपको उपरोक्त लक्षण दिखाई दें।
* यदि आपको फैटी लीवर होने का खतरा है।
ध्यान दें: यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है और किसी भी तरह से चिकित्सकीय सलाह नहीं है। किसी भी बीमारी के लिए हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें।

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